“पलायन”

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“पलायन” कहानी एक आम आदमी की :-

पैदल सड़कों पर चलते जा रहे ये लोग,
कितने लापरवाह,अभद्र,असंवेदनशील है ।

है ना?

हाथों में पॉलीस्टर के झोले औऱ थैले लिए,
साथ में बीवी और बच्चे,
हाथ दुखने लगे तो झोला ,
दाहिने हाथ से बाये हाथ में थामते हुए,
बच्चों के पैर दुःखे तो उन्हें भी,
अपने कांधे पर लादे चलते हुए ।
एक ने तो कमजोर बीवी को भी कंधे पे उठा रखा है,
ये वो प्रेमी युगल है जिनपर फिल्में नहीं बनती,
ये वो मोहब्बत है जो वैलेंटाइन डे नहीं मनाता,
ये वो बाप है जो फादर्स डे तक नहीं जानता।

पराये शहर जहाँ रोटी की जुगाड़ में आया था,
हमारी दीवार,घर और खिड़कियों को बनाया था ,
आज जा रहा है शहर छोड़ कर
ना किसी से उम्मीद लिए,ना किसी से बैर,
बस अपनी फूटी किस्मत को कोसता हुआ।

ना इसके पास खाना है ना पानी
इसकी दूरी लंबी है, ना जाने मंज़िल कब है आनी ,
थकता, रुकता ,सुस्ताता हुआ,
किसी वर्दीवाले के हाथों बीवी बच्चों के सामने मार खाता हुआ,
आज-कल-परसो ,ये पहुँच ही जाएगा अपने घर ।

पर शायद समझदार,सभ्य,शिक्षित और संवेदनशील हम कही नहीं पहुचेंगे ,
हम उनके ही हाथो बने घरों में बैठकर,
उनके ही जात के लोगों के उगाये अनाज को खाकर
उन्हें कोसेंगे,
“कितने बेशर्म है ये लोग,
सरकारी हिदायते मानने के वक़्त पर,
अपने घरो में रहकर देशभक्ति का परिचय देने की बजाय,
सड़को पर निकल आये है ये लोग”

अफसोस कि दुःख उनका समझा ही नहीं हमने,
आशियाना नहीं है उनका इस शहर में,
दिनभर पसीना बहाकर,
दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वाली ‘प्रजाति’ है ये ।

शायद हम होमोसेपियंस की अव्वल प्रजाति बन गए,
पर ये जंगली, मेहनती, ईमानदार ही रहे ।

अब हम सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाएंगे ,
चंद रुपये किसी फण्ड में डालकर स्क्रीनशॉट भी लगाएंगे,
पर ना जाने किस हैशटैग के बाद,
ये मजदूर प्रजाति हमसे,
हमारे घरों की दीवारों में लगे अपने पसीने वापस मांगने आ जाएगी,
और तब हम बेघर होंगे,
अपने ही शहर में,
ठीक उनकी तरह,
जो पैदल सड़क पर चलते जा रहे है ।

ये पलायन रुक जाता,
अगर हमारी थाली का आधा खाना
उनके पेट में चला जाता ।
या हमारे मुँह से निकली सान्त्वना,
उनके कानो में चली जाती।

पर शायद हमारी प्रजाति में,
थाली के खाने और मुँह की वाणी को,
दान नहीं समझा जाता,
और शायद ये काम
शेयर,लाइक और रिट्वीट के लिए मोहताज नहीं होता ।।

  • लेखक :- अजय राजभर

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